Thursday, October 1, 2026

कविता न 2 WAITING HAI


’’कुछ सोए हुए, कुछ जागते से,

कुछ ऊँघते, सरपत भागते से।


"कुछ सोए हुए, कुछ जागते से,

 कुछ ऊँघते, सरपत भागते से।

 कुछ रंग, बिरंग फीका कुछ,

 चटपटे ते़ज़ और भीठे कुछ।

 हर सपने मे तुम आते हो,

 फिर जागूँ तो खो जाते हो।

 क्यों चले गए, कुछ बोलो तो,

 एक बार को आँख खोलो तो।

 कुछ और नही ंतो दांत ही दो,

 हम सब में खुद को बॉट  ही दो।

 वापस आएँगे नही बोलेंगे,

 एक बार लिपट के रो लेंगे.’’  

                       | SOURCE :  WAITING HAI

कविता न 2 WAITING HAI

’’कुछ सोए हुए, कुछ जागते से, कुछ ऊँघते, सरपत भागते से। "कुछ सोए हुए, कुछ जागते से,  कुछ ऊँघते, सरपत भागते से।  कुछ रंग, बिरंग फीका कुछ,...